Mahavatar Babaji: लाहिड़ी महाशय और Kriya Yoga का रहस्य

महावतार बाबाजी Mahavatar Babaji: लाहिड़ी महाशय और Kriya Yoga का रहस्य

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Mahavatar Babaji Birth महावतार बाबाजी का जन्म

महावतार बाबा Mahavatar Babaji की जन्म की तिथि तो किसी को भी ज्ञात नहीं है एम. गोविंदन के अनुसार बाबाजी के माता-पिता ने उनका नाम नागराज रखा था। वे 30 नवंबर 203 ईस्वी को श्रीलंका में जन्मे थे। यह जानकारी योगी एएसएए रामैय्या और वीटी नीलकंठन को 1953 में बाबाजी नागराज ने दी थी। कुछ विद्वानों के अनुसार उनका जन्म तमिलनाडु के परान्गीपेट्टै में हुआ था और उनके गुरु का नाम बोगर था।

Mahavatar Babaji का प्रारंभिक जीवन और गृह त्याग

उनका जीवन काफी कठिनाइयों से व्यतीत हुआ और एक बार उन्हें उनकी परिवार वालों द्वारा बेच दिया गया था जिससे व्यथित होकर महावतार बाबाजी ने अपना घर छोड़कर कलकत्ता भाग गए वहां पर उन्हें एक शिष्य मंडली मिली जिसने भी शामिल हो गए और उन्हें उसके बाद एक गुरु की प्राप्ति भी हुई जिन के सानिध्य में रहकर उन्होंने भगवत प्राप्ति का मार्ग को अपना लिया और इस प्रकार कालांतर में उन्होंने स्वयं को जानकर और अपने आप को परम ब्रह्म में विलीन करके हिमालय की गुफाओं में वास करने चले गए।

क्या महावतार बाबाजी Mahavatar Babaji आज भी हिमालय में जीवित हैं

कहा जाता है कि महावतार बाबाजी आज भी जिंदा है और वह हिमालय के किसी अज्ञात गुफा में रहते हैं अपने शिष्यों के साथ।।
महावतार बाबाजी के बारे में हमें आज जो भी पता है वह उनके शिष्यों द्वारा लिखित पुस्तकों के माध्यम से ही प्राप्त है।। उनके अनुसार महावतार बाबाजी हिमालय में रहने वाले 1 सिद्ध संत हैं और अपने पूर्व जन्म में वे श्री कृष्ण अवतार थे महावतार बाबाजी के बारे में कहा जाता है कि वह अजर अमर है और उन्होंने कई सदियों तक योग क्रिया करते हुए हिमालय के गुफाओं में अपना जीवन व्यतीत किया।।

महावतार बाबाजी का स्वरूप | Mahavatar Babaji

उनके प्रमुख शिष्य लाहिड़ी महाशय ने उनका वर्णन अपने किताब में किया है कि महाअवतार बाबाजी देखने में मात्र 25 वर्ष के किसी नवयुवक की भांति हैं और उनकी आंखें सूर्य के समान चमकती हैं उनकी टोली हिमालय के निर्जन गुफाओं में वास करती है।। कुछ इसी प्रकार का वर्णन परमहंस योगानंद जी ने अपनी आत्मकथा योगी कथामृत (Autobiography of a Yogi) में भी किया है।।

रजनीकांत और महावतार बाबाजी का संबंध

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध सुपरस्टार रजनीकांत भी महावतार बाबा के भक्त हैं। उन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनी है। रजनीकांत द्वारा लिखित 2002 की तमिल फिल्म ‘बाबा’ बाबाजी पर आधारित थी।

लाहिड़ी महाशय को महावतार बाबाजी से कैसे मिली दीक्षा?

विश्व के सबसे बड़े ‘योगीराज’ कहलाने वाले संत श्यामाचरण लाहड़ी ने एक बाबा से शिक्षा लेकर योग का मार्ग अपनाया था, जिन्हें महावतार बाबा के नाम से जाना जाता है। परमहंस योगानंद के गुरु स्वामी युत्तेश्वर गिरि लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे।

गुरु लाहिड़ी जी ने सेना की इंजीनियरिंग शाखा के पब्लिक वर्क्स विभाग में गाजीपुर में क्लर्क की नौकरी कर ली थी। 1861 में इनका तबादला हेड क्लर्क के पद पर रानीखेत (अल्मोड़ा) के लिए हो गया। प्राकृतिक छटा से भरपूर पर्वतीय क्षेत्र उनके लिए वरदान साबित हुआ।

एक दिन श्यामाचरण निर्जन पहाड़ी रास्ते से गुजर रहे थे तभी अचानक किसी ने उनका नाम लेकर पुकारा। श्यामाचरण ने देखा कि एक संन्यासी पहाड़ी पर खड़े थे। वे नीचे की ओर आए और कहा- डरो नहीं, मैंने ही तुम्हारे अधिकारी के मन में गुप्त रूप से तुम्हें रानीखेत तबादले का विचार डाला था। उसी रात श्यामाचरण को द्रोणागिरि की पहाड़ी पर स्थित एक गुफा में बुलाकर दीक्षा दी। दीक्षा देने वाला कोई और नहीं, कई जन्मों से श्यामाचरण के गुरु महावतार बाबाजी थे। योगानन्द को पश्‍चिम में योग के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने ही चुना।

महावतार बाबाजी की दो रहस्यमयी घटनाएं

बाबाजी ने अपने शिष्य को जलती लकड़ी क्यों मारी?

परमहंस योगानंद ने बाबा से जुड़ीं दो घटनाओं का अपनी किताब में जिक्र किया है। योगानंद ने लिखा है कि बाबाजी एक बार रात में अपने शिष्यों के साथ धूने के पास बैठे थे। धूने में से एक जलती हुई लकड़ी को उठाकर बाबाजी ने एक शिष्य के कंधे पर दे मारी जिसका शिष्यों ने विरोध किया। तब बाबा ने बताया कि ऐसा करके मैंने आज होने वाली तुम्हारी मृत्यु को टाल दिया है।

पहाड़ से कूदने वाले शिष्य को बाबाजी ने कैसे जीवित किया?

इसी तरह की दूसरी घटना का जिक्र करते हुए योगानंद लिखते हैं कि एक बार बाबाजी के पास एक व्यक्ति आया और वह बाबाजी से दीक्षा लेने की जिद करने लगा। बाबाजी ने जब मना कर दिया तो उसने पहाड़ से कूद जाने की धमकी थी। बाबा ने कहा कि जाओ कूद जाओ और वह व्यक्ति तुरंत ही कूद गया। यह दृश्य देख वहां मौजूद लोग सकते में आ गए। तब बाबाजी ने कहा कि पहाड़ी से नीचे जाओ और उसका शव लेकर आओ। शिष्य गए और शव लेकर आए। शव क्षत-विक्षत हो चुका था। बाबाजी ने शव के ऊपर जैसे ही हाथ रखा, वह धीरे धीरे करके ठीक होने लगा और जिंदा हो गया। तब बाबा ने कहा कि यह तुम्हारी अंतिम परीक्षा थी। आज से तुम भी मेरी टोली में शामिल हुए।

महावतार बाबाजी हमेशा जवान क्यों दिखाई देते हैं?

आधुनिक काल में सबसे पहले लाहड़ी महाशय ने महावतार बाबा से मुलाकात की फिर उनके शिष्य युत्तेश्वर गिरि ने 1894 में इलाहाबाद के कुंभ मेले में उनसे मुलाकात की थी। युत्तेश्वर गिरि की किताब ‘द होली साइंस’ में भी उनका वर्णन मिलता है। उनको 1861 से 1935 के दौरान कई लोगों के द्वारा देखे जाने के सबूत हैं। जिन लोगों ने भी उन्हें देखा है, हमेशा उन्होंने उनकी उम्र 25 से 30 साल की ही बताई है।
योगानंद ने जब उनसे मिले थे तो वे सिर्फ 19 साल के नजर आ रहे थे। योगानंद ने किसी चित्रकार की मदद से उन्होंने महावतार बाबा का चित्र भी बनवाया था, वही चित्र सभी जगह प्रचलित है। परमहंस योगानंद को बाबा ने 25 जुलाई 1920 में दर्शन दिए थे इसीलिए इस तिथि को प्रतिवर्ष बाबाजी की स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है।

महावतार बाबाजी के अन्य भक्त और शिष्य

वर्तमान में पूना के गुरुनाथ भी महावतार बाबाजी से मिल चुके हैं। उन्होंने बाबाजी पर एक किताब भी लिखी है जिसका नाम ‘द लाइटिंग स्टैंडिंग स्टील’ है। दक्षिण भारत के श्री एम. भी महावतार बाबाजी से कई बार मिल चुके हैं। सन् 1954 में बद्रीनाथ स्‍थित अपने आश्रम में 6 महीने की अवधि में बाबाजी ने अपने एक महान भक्त एसएए रमैय्या को संपूर्ण 144 क्रियाओं की दीक्षा दी थी।

क्या महावतार बाबाजी भगवान कृष्ण के अवतार थे?

लाहिरी महाशय ने अपनी डायरी में लिखा कि महावतार बाबाजी भगवान कृष्ण के अवतार थे। योगानंद भी अक्सर जोर से ‘बाबाजी कृष्ण’ कहकर प्रार्थना किया करते थे। परमहंस योगानंद के दो शिष्यों ने लिखा कि उन्होंने भी कहा कि महावतार बाबाजी पूर्व जीवनकाल में कृष्ण के अवतार थे

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