Lord Buddha Lineage: क्या भगवान बुद्ध मनु और इक्ष्वाकु वंश के थे?
भगवान बुद्ध की वंशावली Buddha Lineage: आधुनिक भ्रम और प्राचीन सत्य
Buddha Lineage | भगवान बुद्ध मनु के ही वंश में जन्में थे, किंतु आश्चर्य है कि प्रमुख बौद्ध ग्रंथों में उल्लिखित इस अकाट्य सत्य को बोला जाए तो कई नए तत्त्वदर्शी अनाप-शनाप बोलने लगते हैं। बहुतों को तो बुद्ध के भारतीय होने पर भी संदेह लगता है। बौद्ध कथा साहित्य में भगवान बुद्ध को प्रथम स्वयंभू मनु के कुल में ‘आदित्य-बंधु’ और ‘ओक्काक’ (राजा इक्ष्वाकु का पालि नाम) वंशज बताया गया है।
प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में इक्ष्वाकु वंश के अकाट्य प्रमाण | Buddha Lineage
सुत्त निपात (Sutta Nipata): आदित्य गोत्र का उल्लेख
सुत्त निपात (Sutta Nipata) सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में से एक है। इसके ‘पब्बज्जा सुत्त’ में एक प्रसंग है जहाँ मगध के राजा बिम्बिसार सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) से उनके वंश के बारे में पूछते हैं। | Buddha Lineage
तब बुद्ध उत्तर देते हैं:
“आदिच्चा नाम गोत्तेन, साकिया नाम जातिया।”
(अर्थात: मेरा गोत्र ‘आदित्य’ (सूर्य) है और मेरी जाति ‘शाक्य’ है।)
इसी ग्रंथ में बुद्ध स्वयं को ‘ओक्काक’ (इक्ष्वाकु) के वंश की शाक्य जाति का वंशज बताते हैं। बुद्ध को अपनी जाति मालूम है, और उनको मनु पुत्र होने का गौरव है। Buddha Lineage
दीघ निकाय (Digha Nikaya): शाक्य वंश की उत्पत्ति
बहुत-बहुत समय पहले की बात है तब भगवान बुद्ध शिष्य मंडली में बैठे थे। उनके वचन से एक महाग्रंथ निकला दीघ्घ निकाय (Digha Nikaya)। दीघ निकाय के ‘अम्बट्ठ सुत्त’ में शाक्य वंश की उत्पत्ति की पूरी कथा बुद्ध भगवान खुद बताकर गए हैं। विस्तार से इसमें बताया गया है कि शाक्य जाति राजा ‘ओक्काक’ (राजा इक्ष्वाकु) की वंशज हैं। इस सुत्त में भगवान बुद्ध स्पष्ट करते हैं कि राजा इक्ष्वाकु ने ही शाक्य कुल की नींव रखी थी।
महावंश (Mahavamsa): श्रीलंकाई ग्रंथ में वंशावली
प्राचीन समय में महावंश (Mahavamsa) नाम से श्रीलंका देश में प्रसिद्ध ऐतिहासिक और धार्मिक जुटान कर बहुत से मुनियों ने एक ग्रंथ लिखा है। इसके दूसरे अध्याय (‘सीहला-वंस’) में बुद्ध की वंशावली दी गई है, जो महासंमत से शुरू होकर राजा ओक्काक (इक्ष्वाकु) तक आती है और फिर शुद्धोधन और सिद्धार्थ (बुद्ध) तक पहुँचती है।
ललितविस्तार (Lalitavistara): संस्कृत में इक्ष्वाकु कुल का वर्णन
प्राचीन समय में ललितविस्तार (Lalitavistara) नामक संस्कृत भाषा में बौद्ध ग्रंथ ब्राह्मण मुनियों ने सबको एकत्रित कर भंतों यानी भक्तों के साथ लिखा है जो बुद्ध की बहुत प्राचीन जीवनी है। इसमें भी भगवान बुद्ध को ‘इक्ष्वाकु-कुल-संभूत’ (इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न) कहा गया है।
बुद्धचरित (Buddhacharita): महाकवि अश्वघोष का महाकाव्य
बुद्धचरित (Buddhacharita) तो महाकवि अश्वघोष ने आदि समय में रचा। इस महाकाव्य के पहले ही सर्ग में राजा शुद्धोधन और उनके वंश का वर्णन करते हुए उन्हें भगवान राम के क्षत्रिय इक्ष्वाकु वंश का बताया गया है।
निष्कर्ष: सत्य, कपिलवस्तु की स्थापना और मनु से अटूट संबंध
सत्य ही नारायण हैं, जहां सत्य नहीं तो वहां नारायण भी नहीं रहेंगे। बुद्ध और बुद्धि भी सत्य का मान न रखने पर भ्रष्ट कर देती है।
बौद्ध परंपरा के सभी मतों और मान्य ग्रंथों के अनुसार, राजा इक्ष्वाकु (ओक्काक) के पुत्रों ने ही ब्राह्मणों सहित सभी वर्णों को साथ लेकर कपिलवस्तु नगर की स्थापना की थी, यहीं से ‘शाक्य’ जाति का वंश आगे चला। इसी में मुरा शाक्य से मौर्य जाति आई।
मूल कथासार है कि आध्यात्मिक और वंशानुगत रूप से बुद्ध और मनु (वैवस्वत मनु, जो सूर्य के पुत्र थे) का संबंध अटूट था, है और रहेगा।