Secrets of Tarapith: तांत्रिकों का महातीर्थ महाश्मशान
तारापीठ मंदिर (Tarapith Temple): बंगाल का प्रसिद्ध तांत्रिक तीर्थस्थल
तारादेवी मंदिर, चंडीपुर, रामपुरहाट, बंगाल Tarapith
माँ की आँख का तारा गिरा था यहाँ….
तारापीठ भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के रामपुरहाट उपखंड में स्थित एक शहर और हिंदू सनातन तीर्थस्थल है । यह शहर विशेष रूप से तारापीठ मंदिर और उससे सटे हिंदू श्मशान घाट के लिए जाना जाता है। यह तांत्रिक हिंदू मंदिर देवी तारा को समर्पित है। हर दिन, हजारों तीर्थयात्री प्रसिद्ध तारापीठ मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं। भक्त न केवल पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों से, बल्कि पड़ोसी राज्यों और भारतभर के विभिन्न क्षेत्रों से भी इस पवित्र मंदिर में आशीर्वाद लेने आते हैं।
तारापीठ Tarapith, पश्चिम बंगाल में द्वारका नदी के तट पर स्थित, साहपुर ग्राम पंचायत का एक गाँव है। तारापीठ पुलिस थाना क्षेत्र में स्थित, यह बाढ़ के मैदानों में हरे-भरे धान के खेतों से घिरा हुआ है। यह फूस की छत वाली झोपड़ियों और मछली के टैंकों वाला एक विशिष्ट बंगाली गाँव जैसा दिखता है। यह शहर बीरभूम जिले के रामपुरहाट उप-मंडल से 6 किमी दूर स्थित है।रामपुरहाट और तारापीठ रोड निकटतम रेलवे स्टेशन हैं।
Tarapith तारापीठ का इतिहास
जब माता सती ने पिता के द्वारा शिव के अपमान पर यज्ञ कुंड में कूदकर अपनी जान दी तो शिव महातांडव करने लगे। वे माता के मृत शरीर को कंधे पर लिए तांडव करते हुए ब्राह्मण के विनाश को आतुर हो गए। तभी भगवान विष्णु ने शिव का क्रोध शांत करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से माता के शरीर को छिन्न-भिन्न कर दिया। ऐसे में माता सती के शरीर के अंग देश के विभिन्न भागों में जाकर गिरे। हिन्दुओं के इस महातीर्थ में माता सती के आंख की पुतली का तारा गिरा था। यही कारण है कि इसका नामकरण तारापीठ के रूप में हुआ।
तारापीठ राजा दशरथ के कुलपुरोहित वशिष्ठ मुनि का सिद्धासन भी है। बताया जाता है कि प्राचीन काल में महर्षि वशिष्ठ यहाँ माँ तारा की आराधना करके सिद्धियाँ प्राप्त की थी। उस समय उन्होंने मंदिर का निर्माण करवाया था लेकिन कालांतर में वो मंदिर जमीन के नीचे धंस गया। बाद में ‘जयव्रत’ नामक एक व्यापारी ने इसे फिर से बनवाया।
वामाखेपा (Vamakhepa) और माँ तारा के अलौकिक दर्शन
जिस प्रकार रामकृष्ण परमहंस को माँ काली ने दर्शन दिया था, ठीक उसी प्रकार तारापीठ के सिद्धसंत वामाखेपा को देवी ने दिव्यज्ञान दिया था। माँ महाकाली ने इन्हें शमशान में दर्शन देकर कृतार्थ किया था, लिहाजा तारापीठ तांत्रिकों के लिए भी विशेष स्थान माना जाता है। तारापीठ से 2 कि.मी. की दूरी पर आटला गाँव है जहाँ वामाखेपा का जन्म हुआ था। गरीबी और विपत्ति से जूझते हुए उन्होंने माँ की आराधना की और अल्पायु में सिद्धि प्राप्त की। काली पूजा की रात में वामाखेपा को साधना के दौरान माँ तारा ने दर्शन दिए।
कहा जाता है कि माँ तारा बाघ की खाल पहने हुए एक हाथ में तलवार, एक हाथ में कंकाल की खोपड़ी, एक हाथ में कमल फूल और एक हाथ में अस्त्र लिए हुए प्रकट हुईं। उन्होंने पैरों में पायल पहन रखी थी और उनके केश खुले हुए थे। वामाखेपा के अनुसार, माता ने जीभ बाहर निकाल रखा था और वातावरण रौशनी और सुंगध से भर गया था। महज 18 साल की आयु में सिद्धि प्राप्त करने वाला ये संत 72 साल की आयु में तारापीठ के महाशमशान में अपने प्राण त्याग दिए। अघोरियों के लिए ये स्थान बेहद पवित्र माना जाता है।
महाश्मशान जहाँ बहती है उल्टी गंगा
तारापीठ मुख्य मंदिर के सामने ही महाशमशान है। दिलचस्प बात है कि यहाँ की द्वारिका नदी दक्षिण से उत्तर की दिशा में बहती है जबकि भारत की अन्य नदियाँ उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं।
तारापीठ में तंत्र साधना और मंदिर की वास्तुकला | Tantra Sadhana
तंत्र साधना के लिए इस स्थान को उपयुक्त बताया गया है। महाशमशान में ही यहाँ तारा देवी का पादपद मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि जो भी यहाँ आकर मनोकामना के लिए ध्यान करते हैं, उनकी मनोकामना ज़रूर पूरी होती है। यहाँ पर वामाखेपा सहित कई संतों की समाधियाँ हैं। इसके साथ यहाँ मुंडमालनी प्रमुख है।
कहा जाता है कि काली माँ अपने गले की मुंडमाला यहीं रखकर द्वारका नदी में स्नान करने जाती हैं। यह भी एक शमशान स्थल ही है। ये एक मध्यम आकार का मंदिर है जिसकी दीवार संगमरगर से सजाया हुआ है। इसकी छत ढलान वाली है जिसे ढोचाला कहा जाता है। इसके प्रवेश द्वार पर जो नक्काशी की गई है वो बेहद आकर्षक जान पड़ता है। मंदिर में आदिशक्ति के कई रूपों को दिखाया गया है। देवी की तीन आँखों को यहाँ देखा जा सकता है जिसे तारा भी कहा जाता है। साथ ही भगवान शिव की प्रतिमा भी यहाँ मौजूद है।
माँ तारा का रौद्र रूप & पूजा के विशेष नियम
गर्भगृह में माँ तारा का निवास है जहाँ एक तीन फीट की धातु निर्मित मूर्ति है। माँ तारा की मौलिक मूर्ति देवी के रौद्र और क्रोधित रूप को दिखाता है। इसमें माँ तारा को बाल शिव को दूध पिलाते दर्शाया गया है। बता दें कि यह मंदिर 4:30 बजे सुबह में ही खुल जाता है। यहाँ प्रसाद के तौर पर शराब भी प्रस्तुत किया जाता है। तांत्रिक साधु इसे न केवल माता को चढ़ाते हैं बल्कि पीते भी हैं। इतना ही नहीं, यहाँ पर रोज़ जानवरों की बलि दी जाती है। तंत्र शक्ति को मानने वालों के लिए कामाख्या की तरह ही तारापीठ का महत्व है। शमशान में जलने वाले शव का धुआँ तारापीठ मंदिर के गर्भगृह तक जिसके कारण से इसका महत्व और बढ़ जाता है। तारापीठ आने से तांत्रिकों के लिए सिद्धि प्राप्त करना बेहद आसान हो जाता है।
प्रेत-शिला और पिंडदान का महत्व
मंदिर के निकट स्थिति प्रेत-शिला में लोग पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंड दान करते हैं। मान्यता है कि यहाँ भगवान राम ने भी अपने पिता का तर्पण और पिंडदान किया था। यहाँ देश-विदेश के पर्यटक अपनी मनोकामना पूरी करने आते हैं।