Pranakarshan Dhyan: Surya Chakra को जाग्रत करने की अचूक विधि

Pranakarshan Dhyan की Step-by-Step विधि

Step 1: सही Posture और Body Relaxation

Advertisement

कंही एकांत स्थान में जाओ । समतल भूमि में नरम बिछोना बिछाकर पीठ के बल लेट जाओ । मुँह ऊपर को रहे । पैर , कमर, छाती, सिर सब एक सीध में रहें । दोनों हाथ सूर्यचक्र पर ( आमाशय का वह स्थान जहाँ पसलियाँ और पेट मिलता है) रख लो । मुँह बंद रखो । शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दो मानो वह कोई निर्जीव वस्तु है और उससे तुम्हारा कुछ भी संबंध नहीं है । कुछ देर शिथिलता की भावना करने पर शरीर बिल्कुल ढीला पड़ जाएगा ।

प्राणशक्ति की Visualization (Inhale & Hold) | Pranakarshan Dhyan

अब धीरे- धीरे नाक द्वारा साँस खिंचना आरंभ करो और दृढ़ शक्ति के साथ भावना करो कि विश्वव्यापी महान प्राण भंडार में से मैं स्वच्छ प्राण , साँस के साथ खींच रहा हूँ और वह प्राण मेरे रक्त प्रवाह तथा समस्त नाड़ी – तंतुओं में प्रवहित होता हुआ सूर्य चक्र में इकठ्ठा हो रहा है। इस भावना को कल्पना- लोक में इतनी दृढता के साथ उतारो कि प्राणशक्ति की बिजली जैसी किरणें नसिका द्वारा देह में घुसती हुई चित्रवत दिखने लगें और अपने रक्त का दौरा एवं नाड़ी समूह तसवीर की तरह दिखें तथा उसमें प्राण- प्रवाह बहता हुआ नजर आए।
भावना की जितनी अधिकता होगी , उतनी ही अधिक मात्रा में तुम प्राण खींच सकोगे। फेफडों को वायु से अच्छी तरह भर लो और पाँच से दस सेकंड तक उसे भीतर हि रोके रहो। आरंभ में पाँच सेकंड काफी है, पश्चात अभ्यास बढ़ने पर दस सेकंड तक रोक सकते हैं। साँस रोके रहने के समय अपने अंदर प्रचुर परिमाण में प्राण भरा हुआ अनुभव रहना चाहिए।

Exhale और शरीर से Negative Energy निकालना

अब वायु को मुह के द्वारा बाहर निकालो। निकलते समय ऐसा अनुभव करो कि शरीर के सारे दोष , रोग और विष इसके द्वारा निकाले जा रहे हैं। दस सेकंड तक बिना हवा के रहो और फिर पुर्ववत प्राणाकर्षण प्रणयाम करना आरंभ कर दो। स्मरण रखो कि प्राण आकर्षण का मूल तत्व साँस खिंचने-छोड़ने में नहीं, वरण आकर्षण की उस भावना में है, जिसके अनुसार अपने शरीर में प्राण का प्रवेश होता हुआ चित्रवत दिखाई देने लगता है।

Surya Chakra (सूर्यचक्र) जागरण और इसके Benefits

इस प्रकार की स्वास-प्रश्वास क्रियाएँ दस मिनट से लेकर धीरे-धीरे आधा घंटे तक बढ़ा लेनी चाहिए। श्वास द्वारा खींचा हुआ प्राण सूर्य चक्र में जमा होता जा रहा है, इसकी विशेष रूप से भावना करो। यदि मुँह द्वारा श्वास छोड़ते समय आकर्षित प्राण को भी छोड़ने की भी कल्पना करने लगे तो यह सारी क्रिया व्यर्थ हो जायेगी और कुछ भी लाभ न मिलेगा।
ठीक तरह से प्राणाकर्षण करने पर सूर्यचक्र जाग्रत होने लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि पसलियों के जोड़ का आमाशय के स्थान पर जो गड्ढा है, वँहा सूर्य के समान एक छोटा – सा प्रकाश बिंदु मानस नैत्रों से दिखने लगा है। यह गोला आरंभ में छोटा, थोड़े प्रकाश का धुँधला मालूम देता है, किन्तु जैसे-जैसे अभ्यास बढ़ने लगता है, वैसे-वैसे वह साफ, स्वच्छ, बड़ा और प्रकाशवान होता जाता है। जिनका अभ्यास बढ़ा-चढ़ा है, उन्हें आँखें बंद करते ही अपना सूर्यचक्र साक्षात सूर्य की तरह तेजपूर्ण दिखाई देने लगता है। यह प्रकाशित तत्व सचमुच प्राणशक्ति है। इसकी शक्ति से कठिन कर्यों में अदभुत सफलता प्राप्त होती है।

ध्यान के बाद क्या करें? what to do after Pranakarshan Dhyan

अभ्यास पूरा करके उठ बैठो। तुम्हें मालूम पड़ेगा कि रक्त का दौरा तेजी से हो रहा है और सारे शरीर में एक बिजली-सी दौड़ रही है। अभ्यास के उपरांत कुछ देर शांतिमय स्थान में बैठना चाहिए और हो सके तो किसी सात्विक वस्तु का जलपान कर लेना चाहिए। अभ्यास से उठाकर एकदम किसी कठिन काम में जुट जाना , स्नान,भोजन या मैथुन करना निषिद्ध है। अभ्यास के लिए प्रातः-काल का समय सर्वोतम है।

Leave a Comment