14 Levels of Spiritual Journey | स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा

14 Levels of Spiritual Journey | स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा

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साधक का पथ बाहर से भीतर की यात्रा नहीं है, बल्कि स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से परातीत की एक चढ़ान है। आगमिक एवं आम्नायिक परम्पराओं में जब “चतुर्दश स्तरों” 14 Levels of Spiritual Journey की चर्चा होती है, तो उसका आशय किसी भौतिक लोक-गणना से अधिक, साधक के अन्तःकरण की क्रमशः परिशुद्धि और विस्तार से होता है। ये चौदह स्तर इन्द्रियों की बहिर्मुखता से आरम्भ होकर परम तत्त्व की अखण्ड चेतना में विलीन होने तक की सम्पूर्ण साधना-यात्रा को सूचित करते हैं। 14 Levels of Spiritual Journey

भौतिक स्तर: ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय शुद्धि

सबसे प्रथम स्तर है ज्ञानेन्द्रियों का; श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, रसना और घ्राण। ये पाँच द्वार साधक की चेतना को बाह्य जगत से जोड़ते हैं। सामान्य अवस्था में ये इन्द्रियाँ विषयों की ओर बहती हैं; किन्तु आगम कहता है कि साधना का प्रथम सोपान “इन्द्रिय-निग्रह” नहीं, बल्कि “इन्द्रिय-शुद्धि” है। जब साधक श्रवण को मंत्रमय करता है, दर्शन को देवदर्शन में रूपान्तरित करता है, और स्पर्श को करुणा में, तब वही इन्द्रियाँ साधना के उपकरण बन जाती हैं।
द्वितीय स्तर कर्मेन्द्रियों का है; वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ। ये क्रिया के माध्यम हैं। आम्नायिक दृष्टि से जब तक वाणी शुद्ध नहीं, तब तक मंत्र फलित नहीं; जब तक कर्म पवित्र नहीं, तब तक तत्त्वज्ञान स्थिर नहीं। अतः कर्मेन्द्रियों का संयम केवल दमन नहीं, बल्कि क्रिया का देवत्व है; वाणी को जप में, हस्त को सेवा में, और पग को तीर्थयात्रा में रूपान्तरित करना। 14 Levels of Spiritual Journey

अंतःकरण का परिष्कार: मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त

तृतीय स्तर मन का है। मन ही इन्द्रियों का समाहारक और विक्षेपक है। आगमिक साधना में मन को चन्द्र कहा गया है; चञ्चल, परावर्तक और प्रभावग्राही। जब तक मन विषय-संकल्पों में उलझा है, तब तक साधक बाह्य जगत का दास है। ध्यान, त्राटक, जप और प्राणसंयम के द्वारा मन क्रमशः एकाग्र होता है। यही वह बिन्दु है जहाँ साधना बाह्य अनुशासन से आन्तरिक अवधान में प्रवेश करती है।
चतुर्थ स्तर बुद्धि का है; विवेक की ज्योति। बुद्धि निर्णय करती है, मार्ग चुनती है और सत्य-असत्य का भेद करती है। आम्नायों में इसे ‘महाशक्ति की प्रथम झलक’ कहा गया है, क्योंकि यहीं साधक में आत्मचिन्तन की क्षमता जागती है। जब बुद्धि शास्त्र और अनुभव से परिपक्व होती है, तब साधना अन्धश्रद्धा से ऊपर उठकर अनुभूति की ओर बढ़ती है।
पञ्चम स्तर अहंकार का है; यह वह गाँठ है जो “मैं” और “मेरा” का भेद रचती है। आगमिक मत में अहंकार शत्रु नहीं, अपितु एक अस्थायी केन्द्र है जो अनुभवों को समेटता है। किन्तु साधना में यही केन्द्र विसर्जित होना होता है। जब साधक अपने कर्म, ज्ञान और सिद्धि का अभिमान त्यागता है, तब अहं का आवरण पतला पड़ने लगता है।
षष्ठ स्तर चित्त का है; संस्कारों का भण्डार। यहीं पूर्वजन्मों और वर्तमान जीवन के प्रभाव सुरक्षित रहते हैं। जप, तप और उपासना का गूढ़ प्रयोजन चित्त-शुद्धि ही है। जब चित्त निर्मल होता है, तब ध्यान में सहजता आती है और स्मृति दिव्य बनती है।

सूक्ष्म तत्त्वों में प्रवेश: प्रकृति, पुरुष और माया

इन छह के पार साधक सूक्ष्म तत्त्वों में प्रवेश करता है। सप्तम स्तर प्रकृति का है; त्रिगुणात्मिका शक्ति, जो सृष्टि की आधारभूमि है। साधक जब सत्त्व, रज और तम के खेल को पहचान लेता है, तब वह उनसे असंग होना सीखता है।
अष्टम स्तर पुरुष का है; साक्षी चेतना। यहाँ साधक अनुभव करता है कि वह शरीर, मन या बुद्धि नहीं, बल्कि उनका द्रष्टा है। यह साक्षित्व ही योग का केन्द्रीय बिन्दु है।
नवम स्तर माया का है; विभिन्नता का मूल आवरण। आम्नायिक तंत्रों में कहा गया है कि माया विभाजन का अनुभव कराती है, किन्तु वही शक्ति अन्ततः एकत्व की ओर भी ले जाती है। साधक जब माया को शत्रु नहीं, लीला समझता है, तब उसका बन्धन ढीला पड़ता है।

सीमाओं का अतिक्रमण: पाँच कञ्चुकों के पार

दशम से त्रयोदश स्तर तक पाँच कञ्चुकों; काल, नियति, राग, विद्या और कला का अतिक्रमण है। काल सीमितता का अनुभव देता है; नियति परिस्थिति का बन्धन; राग आसक्ति का आकर्षण; विद्या सीमित ज्ञान; और कला सीमित क्षमता। जब साधक इन सीमाओं को पहचानकर उनके पार जाता है, तब उसकी चेतना विस्तार पाती है।

अंतिम स्तर: परम तत्त्व (शिव या परब्रह्म) में विलय

चतुर्दश और अंतिम स्तर परम तत्त्व का है; शिव या परब्रह्म। यहाँ न इन्द्रिय है, न मन, न कञ्चुक; केवल अखण्ड चैतन्य है। आगम इसे “अनुत्तर” कहता है; जिससे ऊपर कुछ नहीं। आम्नाय इसे “महासमरसता” कहता है; जहाँ साधक और साध्य का भेद मिट जाता है।

Spiritual Journey 14 Levels का सार

इस प्रकार साधक के भीतर के ये चौदह स्तर किसी दार्शनिक गणना भर नहीं, बल्कि साधना की जीवित यात्रा हैं। इन्द्रियों के परिष्कार से आरम्भ होकर अहंकार के विसर्जन और माया के अतिक्रमण तक, और अन्ततः परम तत्त्व में लय तक, यही वह चतुर्दश-पथ है जो चतुर्दशी के संधिकाल की भाँति हमें पूर्णता के पूर्व की अन्तिम देहरी तक ले जाता है। यहाँ पहुँचकर साधक जानता है कि यात्रा बाहर नहीं थी; वह स्वयं अपने भीतर के चौदह आवरणों को हटाता हुआ अपने ही परम स्वरूप में प्रतिष्ठित हो रहा था।

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