Alcohol in Ayurveda: शराब ‘अमृत’ है या ‘विष’
Alcohol in Ayurveda: शराब ‘अमृत’ है या ‘विष’
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस शराब Alcohol को दुनिया बुरा कहती है, उसे आयुर्वेद के आचार्यों ने ‘विधिपूर्वक सेवन’ करने पर ‘अमृत’ क्यों कहा?
आचार्य भावमिश्र (भावप्रकाश) के अनुसार, शराब कोई साधारण पेय नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली ‘द्रव्य’ है। जहाँ गीता इसे चेतना के लिए बाधक मानती है, वहीं आयुर्वेद इसे शरीर के ‘स्रोतों’ को साफ करने वाली औषधि के रूप में देखता है।
लेकिन सावधान! यह ‘अमृत’ तभी है जब इसके साथ ‘युक्ति’ और ‘मर्यादा’ का पालन हो। शराब पीना और ‘युक्ति’ के साथ शराब पीना— इन दोनों में जीवन और मृत्यु का अंतर है। क्या आप जानते हैं कि खाली पेट पीना आयुर्वेद में वर्जित क्यों है? क्यों मदिरा के साथ घी और मेवे खाने की सलाह दी गई है?
जानिये आचार्य चरक और सुश्रुत के वो नियम, जो केवल विवेकपूर्ण लोगों के लिए लिखे गए हैं। मर्यादा और विज्ञान का यह संगम आपकी आँखें खोल देगा।
Alcohol in Ayurveda vs Bhagavad Gita: जहर या अमृत का रहस्य
मानवता की रक्षा के लिए सत्य को उसके पूर्ण स्वरूप में जानना आवश्यक है। अब तक हमने मदिरा के विनाशकारी पक्षों को देखा, लेकिन यदि हम केवल एक पक्ष को देखें तो यह आयुर्वेद के प्रति अन्याय होगा। भावमिश्र हों या चरक या हों सुश्रुत और बाङ्भट्ट सभी ने जहाँ मदिरा के दुष्प्रभावों की चेतावनी दी है, वहीं उन्होंने इसे ‘विधिपूर्वक’ सेवन करने पर ‘अमृत’ के समान गुणकारी भी बताया है।
इस भाग में हम गीता के आध्यात्मिक अनुशासन और आयुर्वेद के व्यवहारिक विज्ञान के उस बारीक अंतर को समझेंगे, जहाँ मदिरा ‘विष’ से ‘औषधि’ बन जाती है।
गीता का मार्ग:
श्रीमद्भगवद्गीता एक अध्यात्म शास्त्र है जिसका लक्ष्य ‘मोक्ष’ है। भगवान कृष्ण तामसिक आहार (बासी, दुर्गंधयुक्त, अपवित्र) का निषेध करते हैं क्योंकि वह बुद्धि को ढकता है। चूंकि मदिरा किण्वन से बनती है और विवेक को प्रभावित करती है, इसलिए आध्यात्मिक साधक के लिए यह पूर्णतः वर्जित है। गीता ‘शुद्धि’ पर बल देती है ताकि साधक का मन सात्विक बना रहे।
आयुर्वेद का मार्ग
आयुर्वेद का मार्ग यथार्थवादी है। आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है। आयुर्वेद कहता है —
“मदिरा Alcohol तीक्ष्ण, गर्म, रूक्ष और सूक्ष्म होती है जो शरीर के स्रोतों को साफ करती है। यदि इसे सही विधि, मात्रा और पात्र, युक्ति पूर्वक के साथ लिया जाए, तो यह अमृत के समान फल देती है।
Ayurvedic Benefits of Alcohol: मदिरा के औषधीय गुण
आचार्यों ने मदिरा के उन गुणों का वर्णन किया है जो विशिष्ट स्थितियों में हितकर हो सकते हैं:—
- स्रोतोविशोधनम्: यह शरीर के सूक्ष्म रास्तों की सफाई करती है।
- दीपन-पाचन: यह जठराग्नि को तीव्र कर पाचन में सहयोग करती है।
- हृद्य: यह हृदय के अवरोधों को कम करने और मानसिक उत्साह बढ़ाने में सहायक मानी गई है।
- भय-शोक नाशक: उचित मात्रा में यह तनाव और भय को कम करने वाली औषधि का कार्य करती है।
- श्रमहर: मदिरा शरीर की थकान मिटाती है।
- औषधीय उपयोग: अनिद्रा, अरुचि और कुछ विशेष वात रोगों में आचार्यों ने इसे औषधि की तरह प्रयोग करने का निर्देश दिया है। आचार्य सुश्रुत के काल में शल्य क्रिया के समय बेहोश करने का काम भी लिया जाता रहा था
मदिरा के प्रति आचार्यों का अन्य मत :—
“प्राणाः प्राणभृतमन्त्रं तदयुक्त्या निहन्त्यसून्।
विषं प्राणहरं तच्च युक्तियुक्तं रसायनम् ।।”
(अन्न मनुष्यों का प्राण है किन्तु बिना युक्ति के सेवन किया गया अन्न प्राणों का नाश कर डालता है। विष यद्यपि प्राणनाशक द्रव्य है किन्तु युक्तिपूर्वक सेवन से रसायन हो जाता है।) शंखिया, कुचला, पारा आदि को युक्तिपूर्वक सेवन करने से रसायन और जीवन-रक्षक बन जाता है।
” विधिना मात्रया काले हितैरन्नैर्यथाबलम्।
प्रहृष्टो यः पिबेन्मद्यं तस्य स्यादमृतं यथा ॥”
(विधिपूर्वक, उचित काल में, मात्रानुसार, उचित आहारों के साथ, अपनी शक्ति के अनुसार और प्रसन्न होकर जो मद्यपान करते हैं उन्हें यह मद्य अमृत के समान हितकर होता है।।)
Right Way to Drink Alcohol: आयुर्वेद के अनुसार मद्यपान के नियम और ‘युक्ति
आचार्य स्पष्ट करते हैं कि मदिरा स्वयं में न अच्छी है न बुरी; सारा अंतर ‘विधि’ का है। जैसे अन्न को यदि गलत तरीके से लिया जाए तो वह मारक हो सकता है, वैसे ही मदिरा यदि विधिपूर्वक न लिया जाये तो वह भी रोगोत्पादक हो जाता है।
आचार्यों द्वारा बतायी “विधि” या ‘युक्ति’ की मुख्य बातें:
Anupan and Diet: शराब के साथ क्या खाएं?
आचार्य चरक और भावमिश्र स्पष्ट करते हैं कि मदिरा कभी भी खाली पेट या सूखे कंठ से नहीं पीनी चाहिए।
नियम:
मदिरा के साथ ‘स्निग्ध’ और ‘पुष्ट’ भोजन अनिवार्य है। जैसे—मांस-रस (सूप), घी से बने पदार्थ, मेवे, या ताजे-मीठे फल और सलाद। क्योंकि मदिरा रुक्ष होता है। पीने से शरीर में ‘रूक्षता’ बढ़ाती है। यदि साथ में स्निग्ध भोजन न हो, तो यह शरीर की धातुओं को सुखा देती है।
Physical & Mental State: शारीरिक और मानसिक शुद्धि
स्नान और शुद्धि:
मदिरा पान से पहले स्नान करना, स्वच्छ वस्त्र पहनना और मन को प्रसन्न रखना ‘युक्ति’ का हिस्सा है।
विवेक:
व्यक्ति को अपनी ‘शक्ति’ और ‘मर्यादा’ का ज्ञान होना चाहिए। यदि मन तनावपूर्ण या क्रोधित है, तो मदिरा विष का काम करेगी।
Limit & Quantity Of Alcohol: मदिरा की सही मात्रा
मात्रा:
मात्रा के सम्बन्ध में आचार्यों का मत है कि जबतक स्मृति, बुद्धि और विवेक बनी रहे; क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों पर मद का प्रभाव भिन्न-भिन्न होता है, यानि मद का प्रथम चरण या द्वितीय चरण पहुंचने तक की मात्रा। तीसरा-चौथा चरण रोगोत्पादक होता है।
पात्र:
स्वर्ण, रजत या कांच के स्वच्छ पात्रों का ही विधान है, ताकि धातुगत अशुद्धि न हो।
Time, Place & Environment: मद्यपान के लिए उचित देश और काल
ऋतु:
गर्मी में मदिरापान मना तो नहीं किये हैं, परंतु सावधानीपूर्वक निर्देश है। ठंढी जगह अत्यंत पतला (जलयुक्त) करके पीने का विधान है। वर्षा और शीत ऋतु में इसे औषधि रूप में स्वीकार किया गया है।
स्थान:
उन उपवनों में जहां सुगन्धित एवं सुंदर पुष्प खिले हों, भ्रमर मीठी-मीठी गुञ्जार कर रहे हों, कोयल कूक रही हो और शीतल मन्द एवं सुगन्ध वायु बह रहा हो उन मन्दिरों या भवनों में जो चूना से उज्ज्वल श्वेत हों, सुगन्धित धूप से सुगन्धित हो रहे हों, जहाँ बड़े २ उपधानों (तकियों या मसनदों) से युक्त गद्दे बिछे हों, पलंगों पर उत्तम बिस्तर बिछे हों, या गद्देदार कुर्सियों पही हों, बैठ कर अथवा उपधानों के सहारे तिरछे बैठ कर और अत्यन्त प्रसन्न होकर मद्यपान करेें, और सुनिये-मद्य सोना, चान्दी अथवा मणियों के पात्रों में पीना चाहिये । और उन ललनाओं के हाथों से दी गई सुरा प्रसन्न होकर पीना चाहिये जो सुन्दरता एवं यौवन के मद से मदमत्त हो रहीं हों, अत्यन्त प्रिया हो, माला, भूषण एवं वस्त्रों से विभूषित हों और जिनके नेत्र हरिणी के से हों
Conclusion: मदिरा पर आयुर्वेद का अंतिम निष्कर्ष
लेख का उद्देश्य शराब का अंध-समर्थन करना नहीं, बल्कि यह बताना है कि “अविधि” ही विनाश की जड़ है। जहाँ गीता आध्यात्मिक ऊंचाई के लिए इसे पूर्णतः त्यागने को कहती है, वहीं आयुर्वेद शरीर को एक ‘यंत्र’ मानकर मदिरा को उसके ईंधन (सही मात्रा में) के रूप में देखता है। लेकिन याद रहे, यह ‘अमृत’ केवल उनके लिए है जिनके पास इसे पचाने का सामर्थ्य और इसे रोकने का विवेक है। तमोगुणी व्यक्ति के लिए आचार्यों ने परहेज बताया है।